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संघ शाखा द्वारा ही गुणों का विकास – आर.एस. एस सरसंघचालक श्री मोहन भगवत

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने कहा कि प्रतिदिन शाखा को जाने से स्वयंसेवकों की गुणों में विकास होती है। पश्चिम गोदावरी जिले के पालाकोल्लु में रविवार 26/12/2021 को आयोजित ‘गोदावरी संगमम’ कार्यक्रम में श्री भगवत मुख्य वक्ता थे।

आइए इस गोदावरी संगम पर आरएसएस सरसंघचालक के भाषण के मुख्य विषयों की संक्षिप्त जाँच करें, जिसमें उभय गोदावरी जिलों के 12,736 स्वयंसेवकों ने भाग लिया था।…

“संघ में हम शाखा में आते हैं और अपने जीवन में बदलाव लाते हैं। इस प्रकार एक पवित्र प्रतिज्ञा करते हुए, समुदाय अंतिम साँस तक उसी के अनुसार कार्य करेगा। भगवान कृष्ण भगवतगीता में धर्म के बारे में बात करते हैं। हम हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज को संरक्षित करने का संकल्प लेते हैं।हिन्दू धर्म की रक्षा का अर्थ है धर्म की कमियों को दूर करना। हमें कमियों को क्यों सुधारना चाहिए इसका कारण यह है कि हम एक ही धर्म में पैदा हुए हैं। हमारा काम ऐसी कमियों को दूर करना और धार्मिकता की रक्षा करने वालों को एकत्रित करना है।

धर्म का मतलब कई सिद्धांत नहीं हैं। प्राचीन काल से ऋषि- मुनियों के द्वारा जो दार्शन करके आचरण किये वो धर्म है।

ऐसे दर्शन करने वाले अन्य धर्मों में कहीं नहीं मिलते। हमारे धर्म में सत्य है। कोई दुश्मनी नहीं है। तो अन्य धर्मों को नाश करने का विचार हमारे धर्म में नहीं है। यह विचार है कि लक्ष्य एक ही है, चाहे हम किसी भी रास्ते पर हों हमारे धर्म में है इसलिए किसी को भी हमारे धर्म में परिवर्तित होने के लिए नहीं कहा जा सकता है।

लेकिन अन्य धर्म के लोग प्रलोभ करके अपना धर्म बदलने के लिए कोशिश कर रहे हैं। हमें अपने सभी हिंदुओं को अपने हिंदू धर्म के सच्चे सिद्धांत से अवगत कराना चाहिए और यह देखना चाहिए कि वे अपना धर्म नहीं बदलते हैं। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। समाज को जोड़कर इस कार्य में तेजी लाई जाए।

हम पूरे हिंदू राष्ट्र का आयोजन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमें इस विचार के साथ एक होना चाहिए कि हम सभी एक हैं, चाहे भाषा या प्रान्त कुछ भी हो।

हमें हिंदू धर्म में पाए जाने वाले सत्य, करुणा, पवित्रता, परिश्रम और तपस्या के आधार पर सभी को एकजुट करके अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए। धर्म की रक्षा अभ्यास से ही होती है। संस्कृति धार्मिकता का प्रतिबिंब है। हम सब एक हैं, समाज में अलग-अलग भावनाओं के बावजूद हमारी संस्कृति एक है।

हम स्वतंत्रता के 75 वर्ष का अमृतोस्तव मना रहे हैं । इस प्रांत के अल्लूरी सीतारामराज स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए थे। वे हमेशा भारत के आदर्श और पूज्य हैं। हम ऐसे लोगों के वंशज हैं। समस्त हिन्दू समाज को एकत्रित करके इस देश को वैभव लाने का प्रयास करना चाहिए। यह कार्य स्वयंसेवकों के नेतृत्व में शुरू किया जा रहा है।

मैं कैसा स्वयंसेवक हूँ? हमें यह सोचना चाहिए। अपनी प्रार्थना में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह “अजयंचा विश्वस्या देहिशा शक्तिम्” की विश्व को जीतने की अजेय शक्ति प्रदान करें। हम तुरंत कहते हैं “सुशीलम जगद येना नम्रम भवेत”। हम ऐसी सुशीलता चाहते है कि पूरी दुनिया घुटनों पर प्रणाम करें। हम चाहते हैं कि ईश्वर हमें हमारे काम को आसान बनाने और उसमें आने वाली कठिनाइयों को दूर करने की बुद्धि दे। हम चाहते हैं कि इहपरलोक में महानता प्राप्त करने की वीरव्रत प्रदान करें।

हम अपने लक्ष्य तक पहुँचने के प्रयत्न में जहाँ कई तरह के आकर्षण, दबाव और प्रलोभन होने पर भी जीत ने की ध्येय निष्ट प्रदान करें। हमें ये पांच गुण चाहिए। इन पांच गुणों को प्राप्त करने का केंद्र संघ की शाखा है। इसके लिए हमें हर दिन शाखा जाना पड़ता है। उसके माध्यम से ही हमें संस्कार मिलते हैं।

इसलिये शरीर, मन और बुद्धि के विकास के साथ-साथ सभी के साथ मिलकर काम करने की आदत हमें शाखा के माध्यम से उपलब्ध होती जा रही है। इन गुणों को हासिल करने के बाद हमें इस काम को सभी गांवों और सभी बस्ती तक ले जाने की जरूरत है। इसलिए सभी जिम्मेदार कार्यकर्ताओं को भी सामाजिक कार्यों के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए! सभी गांवों और बस्ती में अभ्यास केंद्र स्थापित किए जाएं। इसके अलावा कुछ कार्यकर्त्ताओं को पूर्ण समय बिताने को आवश्यकता है। तभी समाज हम पर भरोसा करेगा। हमारे साथ आता है।

इस कार्यक्रम में नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी के प्रमुख श्री अल्लूरी वेंकट नरसिम्हा राजू मुख्य अतिथि थे। सह क्षेत्र संघचालक श्री दूसी रामकृष्ण, प्रान्त संघचालक श्री नागरेड्डी हरि कुमार रेड्डी, सह प्रान्त संघचालक श्री सुनकवल्ली रामकृष्ण, भीमावरम विभाग संघचालक श्री मंथेना रामचंद्रराजू, राजामहेंद्रवरम विभाग संघचालक श्री रिम्मालापुडी सुब्बाराव ने कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम का निरीक्षण क्षेत्र एवं प्रान्त के संघ अधिकारियों ने किया।

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